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Tere ishq ki intihaa by Allama Iqbal (in Hindi)

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          ग़ज़ल     तेरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूं, मेरी सादगी देख क्या चाहता हूं. सितम हो कि हो वादा ए बे हिजाबी, कोई बात सब्र आज़मा चाहता हूं. यह जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को, कि मैं आपका सामना चाहता हूं. ज़रा सा तो दिल हूं मगर शोख़ इतना, वहीं लन तरानी सुना चाहता हूं. कोई दम का मेहमां हूं ऐ अहले महफ़िल, चिराग़ ए सहर हूं बुझा चाहता हूं. भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी, बड़ा बे अदब हूं सज़ा चाहता हूं. अल्लामा इक़बाल मुश्किल अल्फ़ाज़:      ☆  इंतिहा --- आख़िर, हद, अंजाम.      ☆   सितम --- ज़ुल्म, सख़्ती.      ☆   बे हिजाबी --- बे पर्दा, चेहरा दिखाना.      ☆   सब्र आज़मा --- सब्र आज़माने वाली.      ☆   जन्नत --- स्वर्ग.      ☆   ज़ाहिद --- धार्मिक, इबादत गुज़ार.      ☆   शोख़ --- चंचल.      ☆   लन तरानी --- शोखी, ढींग, तू मुझे नहीं देख सकता.     ...

Sare Jahan Se Achha by Allama Iqbal: Ghazal (in Hindi)

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-           तराना ए हिन्द सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिस्तां हमारा. परबत वो सबसे ऊंचा हमसाया आसमां का, वह संतरी हमारा वह पासबां हमारा. ग़ुरबत में हो अगर हम रहता है दिल वत़न में, समझो वहीं हमें भी दिल हो जहां हमारा. गोदी में खेलती हैं उसकी हज़ारों नदियां, गुलशन है जिनके दम से रश्क ए जहां हमारा. ऐ आबरुदे गंगा वह दिन है याद तुझको, उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा. मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिंदी हैं हम वतन है हिन्दुस्तां हमारा. यूनान व मिस्र रोमा सब मिट गए जहां से, अब तक मगर है बाक़ी नामो निशां हमारा. कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे ज़मां हमारा. इक़बाल कोई मह़रम अपना नहीं जहां में, मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहां हमारा.              अल्लामा 'इक़बाल' ----------------------------------- मुश्किल अल्फ़ाज़:     ☆ गुलिस्ता...