Insha Ji Utho by Ibne Insha: Ghazal(in Hindi)
- ग़ज़ल इंशा जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या, वह़शी को सुकूं से क्या मत़लब जोगी का नगर में ठिकाना क्या. इस दिल के दरीदा दामन को देखो तो सही सोचो तो सही, जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली का फैलाना क्या. शब बीती चांद भी डूब चला ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में, क्यों देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या. फिर हिजर की लंबी रात मियां संजोग की तो यही एक घड़ी, जो दिल में है लब पर आने दो शरमाना क्या घबराना क्या. उस रोज़ जो उनको देखा है अब ख़्वाब का आलम लगता है, उस रोज़ जो उन से बात हुई वह बात भी थी अफ़साना क्या. उस ह़ुस्न के सच्चे मोती को हम देख सके पर छू ना सके, जिसे देख सके पर छू न सके वह दौलत क्या वह ख़ज़ाना ...