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Showing posts with the label मिर्ज़ा ग़ालिब

Aah ko chahiye by Mirza Ghalib (in Hindi)

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                  ग़ज़ल आह को चाहिए एक उमर असर होने तक, कौन जीता है तेरी जुल्फ़ के सर होने तक. दाम हर मौज में है हालक़ा ए सदकामे नहंग, देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक. आशिकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब, दिल का क्या रंग करूं ख़ून ए जिगर होने तक. हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन, ख़ाक हो जायेंगे हम तुझ को ख़बर होने तक. परतवे ख़ूर से है शबनम को फ़ना की तालीम, मैं भी हूं एक इनायत की नज़र होने तक. यक नज़र बेश नहीं फ़ुरसत ए हस्ती ग़ाफिल, गर्मी ए बज़्म है इक रक़्शे शरर होने तक. ग़मे हस्ती का असद किससे हो जुज़ मर्ग इलाज, शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक.                 मिर्ज़ा ग़ालिब मुश्किल- अल्फ़ाज़:      ☆  आह- बददुआ.      ☆ सर- जीतना.      ☆ दाम- जाल.      ☆ मौज- लहर.      ☆ हलक़ा- इलाका.      ☆ सदकाम- सौ मुंह वाला.      ☆ नहंग- मगरमच्छ.      ☆ हालक़ा ए ...

Ibne Mariyam by Mirza Ghalib : Ghazal (in Hindi)

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       -                    ग़ज़ल इब्ने   मरियम  हुआ   करे   कोई, मेरे   दुःख   की    दवा करे  कोई. चाल  जैसे  कड़ी कमान का तीर, दिल  में  ऐसे  कि  जा  करे  कोई. शरअ  व  आईन  पर मदार सही, ऐसे  क़ातिल  का  क्या करे कोई. बात   पर  वां  ज़ुबान  कटती  है, वो   कहे   और  सुना  करे  कोई. बक रहा हूँ जुनूं में क्या क्या कुछ, कुछ  न  समझे  ख़ुदा  करे  कोई. न  सुनो   गर   बुरा   कहे    कोई, न  कहो   अगर  बुरा  करे   कोई. कौन  है  जो  नहीं   है  हाजतमंद, किसकी  हाजत  रवा   करे  कोई. रोक   लो   गर  ग़लत  चले  कोई,...

Ye Na Thi Hamari Qismat by Mirza Ghalib :Ghazal (in Hindi)

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-           ग़ज़ल      यह न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल ए यार होता,      अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता.      तेरे वादे पर जिए हम तो यह जान झूठ जाना,      कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता.      कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर ए नीम कश को,      ये ख़लिश कहां से होती जो जिगर के पार होता.      तेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अहद ए बोदा,      कभी तू ना तोड़ सकता अगर उस्तवार होता.      यह कहां की दोस्ती है कि बने है दोस्त नास़ेह़,      कोई चारासाज़ होता कोई ग़म गुसार होता.      रग ए संग से टपकता वह लहू कि फिर न थमता,      जिसे ग़म समझ रहे हो यह अगर शरार होता.      हुए मर के जो रुसवा हुए क्यूं न ग़र्क़ ए दरिया,      न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता.      उसे...

Tum Jano Tum Ko Ghair Se by Mirza Ghalib: (in Hindi)

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 -                   ग़ज़ल तुम जानो तुम को ग़ैर से      जो रस्मो राह हो, मुझ को भी पूछते रहो      तो क्या गुनाह हो. बचते नहीं मुआख़िज़ा ए      रोज़े हश्र से, क़ातिल अगर रक़ीब है      तो तुम गवाह हो. क्या वह भी बेगुनाह      कश व ह़क़ नाशनास हैं, माना कि तुम बशर नहीं      ख़ुर्शीदो माह हो. उभरा हुआ नक़ाब में है      उनके एक तार, मरता हूं मैं कि यह न       किसी की निगाह हो. जब मयकदा छुटा तो फिर      अब क्या जगह कि क़ैद, मस्जिद हो मदरसा हो      कोई ख़ानक़ाह हो. सुनते हैं जो बहिश्त की      तारीफ़ सब दुरुस्त, लेकिन ख़ुदा करे वह      तेरा जलवा गाह हो. ग़ालिब भी गर न हो तो      कुछ ऐसा ज़रर नहीं, दुनिया हो या रब और      मेरा बादशाह हो.             ...